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Tuesday, 18 July 2017

स्वर्ग और नर्क

कोई तपस्वी साधु सन्यासी अप्सरा के लिए प्राण नहीं देता है ना लेता है | आज तक सुना है | अप्सरा पाना है तो आज हजार की जान लेना है | अतः हिन्दू एक शूद्रत्व से मोक्षत्व तक का मार्ग है |

ये बातें उसको नहीं समझ में नहीं आएगी जो ७२ हुड के लिए जान देता हो | कभी पढ़ा है की बड़े साधु ने अप्सरा के लिए तप किया है | अप्सरा साधु सन्यासी के तप भंग करने आते थे | लेकिन फिर भी वो हरी के लिए साधना करते है | अतः हर के लिए मरने वाले कामी कापुरुष के मुंह से ये सब बातें अछि नहीं लगती है |
आज दिन रात जो राक्षस मल्लेछ हुड के लिए जान देते और लेते है उसे ऐसी बातें करना शोभा नहीं देता है |


अब सच जाने |
मृत्यु भवन के राजा दो है| काल ( धर्मराज ) और इंद्र
धर्मराज को सब जानते है | जो पापी जीव को दंड देते है |
अब बात करे देवराज इंद्र कि ये भगवान् विष्णु के ही अंश है | जो पालन कार्य में सहायता करते है | भगवान इन्द्र को जीव को हर इन्द्रिय में में वास् माना गया है |
मोक्ष पाने के लिए जीव को पाप और पुण्य से ऊपर उठकर ब्रह्म में लें होना पड़ता है | जब जीव को दुःख और सुख का गति से मुक्ति नहीं मिलती तब तक परमात्मा नहीं मिलता है |
जहाँ धर्मराज बहुत सारा कष्ट देकर जीव की परीक्षा और पवित्रता की जाँच करता है | उसी प्रकार भगवान् इंद्र जीव को सुख और मोक्षता की जाँच करते है | धर्मराज के यम जिस प्रकार जीव को प्रताड़ना देते है | उसीप्रकार भगवान् इंद्र के अप्सरा और उनके देवगन जीव को सुख देते है | जिससे जीव की परीक्षा हो जाये | अगर जीव हर सुख और दुःख में भगवान हरी को नहीं भूलता तो उसे मुक्ति मिल जाती है | मतलब हरिपद प्राप्त होआ है | अप्सरा , यक्ष, गंधर्व ,कामदेव इत्यादि इंद्र के सहायक है |
अतः जीव को काल और इंद्र दोनों की परीक्षा में सफल होना पड़ता है |
स्वर्ग और नर्क दोनों जगह से दुख और सुख भोगने के बाद पुनः जन्म होता है | ये क्रम तबतक चलता है जब तक जीव मोक्ष ना पाले |

किसी भी तपस्वी ऋषि ने अप्सरा पाने के लिए तपस्या नहीं की | किसी ने स्वर्ग पाने के लिए कुछ भी नहीं किया | इन्होने सर्वस्व हरि को दिया और हरि में विलीन हो गया |
कभी कोई तपस्वी इन्द्रासन के लिए तप नहीं करते है | उसे सिर्फ राम चाहिए |
कोई तपस्वी साधु सन्यासी अप्सरा के लिए प्राण नहीं देता है ना लेता है | आज तक सुना है | अप्सरा पाना है तो आज हजार की जान लेना है | अतः हिन्दू एक शूद्रत्व से मोक्षत्व तक का मार्ग है |
ये बातें उसको नहीं समझ में नहीं आएगी जो ७२ हुड के लिए जान देता हो | कभी पढ़ा है की बड़े साधु ने अप्सरा के लिए तप किया है | अप्सरा साधु सन्यासी के तप भंग करने आते थे | लेकिन फिर भी वो हरी के लिए साधना करते है | अतः हर के लिए मरने वाले कामी कापुरुष के मुंह से ये सब बातें अछि नहीं लगती है


Monday, 17 July 2017

क्या द्रविड़ भी आर्य है ? हाँ

भारत के दक्षिणी भाग में रहने वाले कन्नड़ी , तेलगु, ओर मलयाली लोगो को द्रविड़ कहा जाता है । यूरोपीय ईसाई लोगो ने ऐसा भरम फैला रखा है की आर्य कोई गौरवर्णीय लोगो की जाति थी , जो भारत मे आक्रमक बनकर आयी,
ओर उसने उत्तरभारत में रहने वाले श्यामवर्णीय लोगो द्रविड़ो को खदेड़कर कन्याकुमारी की दिशा में जाकर दक्षिणभारत में बसने पर विवश कर दिया । यह एक बड़ा भरम है ।।

आर्य किसी जाति विशेष का नाम नही ! वह तो एक संस्कृति या समाज की एक विशेषता है। उसे मानकर नियमानुसार जीवन व्यतीत करने वाले सारे आर्यधर्मी , या वैदिक प्रणाली के सनातनधर्मी या हिन्दू कहलाते है ।। उदारहण जो वेदपठन , उपनिषदों का दार्शनिक ज्ञान, महाभारत- रामायण गौ-पूजन कर्म , आदि में श्रद्धा रखते है, उन्हें आर्य कहा जाता है। हमारे द्रविड़ तो पूर्णतया आर्यधर्मी होते है । लेकिन पाश्चत्य गोर ईसाई धर्मियो अज्ञानतावश कुटिल हेतु ऐसा ढोल पिटा की आर्य नाम की एक जाति थी , जिसने द्रविड़ो से छल किया । वर्तमान में भी यही देशतोड़ू इतिहास पढ़ाया जाता है ।।
हिन्दू ऐसी पुस्तको ओर ऐसे लोगो से सावधान रहें । हब्सी, मंगोल, आदि किसी भी जाति का मनुष्य यदि वैदिक समाज पद्धति के अनुसार जीवन यापन करें, तो वह व्यक्ति आर्यधर्मी कहलाता है ।। भारत के द्रविड़ तो पूरे के पूरे कर्मठ आर्यधर्मी है, ना कि आर्य धर्म के शत्रु या विरोधके । ओर तो ओर सारे विश्व मे आर्यधर्म का अधीक्षक , निरीक्षण, व्यवस्थापन करने वाला वर्ग द्रविड़ कहलाता है ।। "द्र" यानी - दृष्टा ओर विर यानी " जानने वाला या ज्ञानी ऋषि-मुनि ।।

यह द्रविड़ लोग भारत ही नही, बल्कि सारे विश्व मे यही भूमिका निभाते है। अतः यूरोप में भी द्रविड़ लोग थे । उन्हें ड्र्यूड Druids कहा जाता है। प्रदेश और भाषा भिन्नता के कारण उन्हें Druids कहा जाता है। लेकिन वास्तव में दोनो की भूमिका एक ही थी । दोनो वैदिक समाज के अधीक्षक, मार्गदर्शक, व्यवस्थापक थे । अतः आर्य ओर द्रविड़ दोनो एक ही है ।।